कुशीनगर: नेबुआ नौरंगिया में बीडीओ आवास ध्वस्तीकरण प्रकरण पर मचा बवाल।
धनंजय कुमार पाण्डेय, व्यूरो चीफ, उत्तर प्रदेश
∆ बिना नीलामी प्रक्रिया के आवास गिराया गया, जिला विकास अधिकारी ने वीडियो से मांगा जवाब — ब्लॉक प्रमुख की भूमिका पर भी उठे सवाल
∆ विकास की आड़ में ध्वस्तीकरण का खेल — शासन की साख पर चोट!
बीडीओ और ब्लॉक प्रमुख पर आरोप, मरम्मत किए गए आवास को जमींदोज कर सरकार की छवि धूमिल करने की कोशिश।
∆ सरकारी धन बर्बाद कर “मरम्मत” के नाम पर भ्रष्टाचार का तांडव!

पांच लाख रुपये से सुधारे गए भवन को तोड़ गिराया गया — जनता पूछ रही है, जवाबदेही कौन तय करेगा?
∆ बीडीओ-प्रमुख की मिलीभगत से बदनाम हुई सरकार की विकास नीति!
बिना नीलामी प्रक्रिया पूरा किए ही सरकारी संपत्ति को ध्वस्त कर, अधिकारियों ने शासन की “जीरो टॉलरेंस नीति” को मज़ाक बना दिया।
∆ मरम्मत के बाद मलबा — जवाब दे ब्लॉक प्रमुख और बीडीओ!
क्षेत्रीय लोग बोले, सरकारी आदेशों को अनदेखा कर विकास को, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाया गया है।
∆ कुशीनगर में अफसरशाही का कारनामा — विकास भवन बना भ्रष्टाचार की मिसाल।
शासन की साख को दागदार करने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग तेज़, डीडीओ ने मांगा जवाब।
नेबुआ नौरंगिया/कुशीनगर

कुशीनगर जनपद के नेबुआ नौरंगिया विकास खंड कार्यालय परिसर में स्थित खण्ड विकास अधिकारी (बीडीओ) आवास को बगैर किसी नीलामी प्रक्रिया या पूर्व अनुमति के ध्वस्त कर दिए जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) अरुण कुमार पाण्डेय ने गंभीरता दिखाते हुए बीडीओ आर.के. सेठ को शो-कॉज नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
बिना प्रक्रिया के ध्वस्तीकरण — पारदर्शिता पर सवाल
जानकारी के मुताबिक, पांच दिन पूर्व विकास खंड कैम्पस में बने बीडीओ आवास को “मरम्मत कार्य” के नाम पर पूर्ण रूप से जमींदोज कर दिया गया।
गौरतलब है कि पांच वर्ष पूर्व क्षेत्र पंचायत द्वारा कार्यदायी संस्था के माध्यम से इसी आवास का लगभग 5 लाख रुपए की लागत से मरम्मती करण का कार्य कराया गया था।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना किसी नीलामी या विभागीय स्वीकृति के सरकारी भवन को ध्वस्त कर देना सीधे तौर पर सरकारी संपत्ति की क्षति और वित्तीय अनियमितता का मामला है।
स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल — वीडियो व ब्लॉक प्रमुख के मिलीभगत के आरोप!
समाचार प्रकाशित होने के बाद हरकत में आए अधिकारी!
क्षेत्रीय लोगों के अनुसार, बीडीओ और ब्लॉक प्रमुख के बीच मिलीभगत के बिना यह कार्य संभव नहीं हो सकता था।
लोगों का कहना है कि जब बीडीओ स्वयं उसी परिसर में निवास करते हैं, तो आवास गिराए जाने की जानकारी उनसे कैसे छिपी रह सकती है?
यह घटना अब तक “अबूझ पहेली” बनी हुई है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि पुराने आवास को तोड़कर नई निर्माण प्रक्रिया शुरू करने की योजना पहले से बनाई गई थी, ताकि ठेके और सामग्रियों की खरीद में जमकर अनियमितताएं की जा सकें।
मामले के उजागर होने के बाद एक पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
समाचार के प्रकाशित होते ही जिला प्रशासन हरकत में आया, और डीडीओ अरुण कुमार पाण्डेय ने तत्काल जांच का आदेश देते हुए बीडीओ से तीन दिन के भीतर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है।
डीडीओ ने कहा —
“यह गंभीर लापरवाही का मामला है। सरकारी संपत्ति का ध्वस्तीकरण शासन की पूर्व अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। मैंने संबंधित बीडीओ को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”
ब्लॉक प्रमुख पर भी शक की सुई!
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे प्रकरण में ब्लॉक प्रमुख की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही है, क्योंकि विकास खंड स्तर पर किसी भी भवन या निर्माण से जुड़ा कार्य उनके संज्ञान में ही किया जाता है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने ब्लॉक प्रमुख पर बीडीओ के साथ मिलीभगत कर पुराने भवन को गिरवाने और भविष्य में नई बिल्डिंग के ठेके से आर्थिक लाभ उठाने की योजना बनाने का आरोप लगाया है।
वित्तीय अनियमितता की जांच की मांग!
ग्रामीणों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि
1. पूरे प्रकरण की तकनीकी और वित्तीय जांच कराई जाए।
2. भवन गिराने में शामिल अधिकारियों और ठेकेदारों पर वित्तीय दंड और विभागीय कार्रवाई की जाए।
3. पूर्व में हुए मरम्मत कार्य के रिकॉर्ड और भुगतान विवरण की ऑडिट जांच कराई जाए।
संभावित कार्रवाई की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, यदि बीडीओ का जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो डीडीओ द्वारा रिपोर्ट मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) को भेजी जाएगी, और इसके बाद बीडीओ पर निलंबन या अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है।