नई दिल्ली : अरावली पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पर्यावरण को गहरा झटका, 90% क्षेत्र खनन के लिए खुलने का खतरा।

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डेस्क, आपकी आवाज़ न्यूज़, नई दिल्ली

∆ सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय ने अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा बदलकर पर्यावरण संरक्षण की रीढ़ तोड़ दी।

∆ नई परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षण से बाहर होकर खनन के हवाले हो सकता है।

∆ दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण संकट के बीच यह फैसला आग में घी डालने जैसा साबित होगा।

∆ मोदी सरकार की नीतियां लगातार पूंजीपतियों के हित में पर्यावरणीय कानूनों को कमजोर कर रही हैं।

∆ अरावली पर हमला सिर्फ पहाड़ियों पर नहीं, आने वाली पीढ़ियों के जीवन पर सीधा हमला है।

नई दिल्ली। गंभीर वायु प्रदूषण से जूझ रहे दिल्ली-एनसीआर के बीच सुप्रीम कोर्ट के अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े हालिया फैसले ने पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों की चिंता और बढ़ा दी है। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने अरावली पहाड़ियों और अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा को मंजूरी देते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के नेतृत्व वाली समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया। इस फैसले के बाद अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन और वनों की कटाई के रास्ते लगभग साफ हो गए हैं।
नई परिभाषा के अनुसार, अरावली जिलों में वही स्थलाकृति अरावली पहाड़ी मानी जाएगी जिसकी ऊंचाई स्थानीय उच्चावच से 100 मीटर या उससे अधिक हो। वहीं, दो या अधिक पहाड़ियां यदि 500 मीटर के भीतर स्थित हों तो उन्हें मिलाकर अरावली पर्वत श्रृंखला माना जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र—जिसमें घासभूमियां और रिज क्षेत्र शामिल हैं—संरक्षण से बाहर हो जाएगा और खनन गतिविधियों के लिए खोल दिया जाएगा।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार यह फैसला अरावली जैसे अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। इतिहास गवाह है कि हरियाणा के सात अरावली जिलों में लाइसेंस प्राप्त खनन ने पहले ही चरखी दादरी और भिवानी जैसे क्षेत्रों में दो अरब वर्ष पुरानी प्राकृतिक विरासत को भारी नुकसान पहुंचाया है। 2009 में वैध खनन पर प्रतिबंध के बावजूद अवैध खनन आज भी बेरोकटोक जारी है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला कोई अलग-थलग घटना नहीं है। बीते वर्षों में सरकार ने वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2023, पर्यावरण प्रभाव आकलन मसौदा 2020 और कोयला ब्लॉकों के वाणिज्यिक आवंटन जैसे कदमों के जरिए पर्यावरणीय सुरक्षा कवच को लगातार कमजोर किया है। हसदेव अरण्य, तलाबीरा और देहिंग पटकाई जैसे क्षेत्रों में इसके दुष्परिणाम साफ नजर आ चुके हैं।
दिल्ली में जहां एक ओर GRAP-2 और GRAP-3 जैसे आपातकालीन प्रावधान लागू हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और खनन को बढ़ावा देना सरकार की कथनी और करनी के अंतर को उजागर करता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अरावली का विनाश जारी रहा तो इसका सीधा असर वायु गुणवत्ता, भूजल स्तर और क्षेत्रीय जलवायु पर पड़ेगा।
इस पृष्ठभूमि में सामाजिक संगठनों ने छात्रों, युवाओं और जागरूक नागरिकों से अपील की है कि वे अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ अरावली को बचाने की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए रहने योग्य धरती को सुरक्षित रखने की निर्णायक जंग है।

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