नई दिल्ली : घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन देने की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठे सवाल।
डेस्क, आपकी आवाज़ न्यूज़, नई दिल्ली
∆ घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी की मांग ठुकराई, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहस तेज!
∆ देश में 5 करोड़ से अधिक घरेलू कामगार, फिर भी न्यूनतम वेतन पर नहीं बनी सहमति!
∆ न्यायपीठ का तर्क – न्यूनतम वेतन तय हुआ तो लोग घरेलू कामगार रखना बंद कर देंगे!
∆ ट्रेड यूनियनों को औद्योगिक विकास में बाधा बताने पर भी उठे सवाल!
∆ श्रम संगठनों ने फैसले को मजदूर हितों के खिलाफ बताते हुए जताई नाराजगी!
नई दिल्ली । घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी देने की मांग से जुड़ी याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने के बाद देशभर में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि इस फैसले से करोड़ों घरेलू कामगारों के अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायपीठ ने 29 जनवरी को घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी को मौलिक अधिकार के रूप में लागू करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। न्यायपीठ का तर्क था कि यदि घरेलू कामगारों के लिए अनिवार्य न्यूनतम मजदूरी तय कर दी जाती है तो इससे कई व्यावहारिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, जैसे बड़ी संख्या में लोग घरेलू कामगार रखना बंद कर सकते हैं और विवादों की स्थिति में मुकदमेबाजी बढ़ सकती है।
हालांकि श्रमिक संगठनों का कहना है कि देश में घरेलू कामगारों की संख्या बहुत बड़ी है और उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार भारत में लगभग 5 करोड़ से अधिक घरेलू कामगार काम करते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है, जो कई घरों में 10 से 12 घंटे काम करने के बावजूद बेहद कम पारिश्रमिक प्राप्त करती हैं।
संगठनों का कहना है कि कई जगह घरेलू कामगारों को 7000 से 8000 रुपये मासिक से अधिक नहीं मिलता। इसके साथ ही भुगतान में कटौती, काम के घंटों की अनिश्चितता, सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न जैसी समस्याएं भी सामने आती रहती हैं।
इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग राज्यों में लंबे समय से आंदोलन और मांगें उठती रही हैं। कुछ राज्यों में सीमित स्तर पर घरेलू कामगारों के लिए नियम और कानून बनाए भी गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी चुनौती बना हुआ है।
इसी संदर्भ में सामाजिक संगठनों ने न्यूनतम मजदूरी को सुनिश्चित करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन याचिका खारिज होने के बाद श्रमिक संगठनों ने निराशा जताते हुए कहा है कि घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू कामगारों को श्रम कानूनों के दायरे में लाने, न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर व्यापक नीति और स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता है, ताकि इस क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों को बेहतर और सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियां मिल सकें।