‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ के मलबे में दबी पत्रकारिता और जलती रसोई।

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डेस्क, आपकी आवाज़ न्यूज़, नई दिल्ली

∆ पश्चिम एशिया युद्ध की आंच भारत की रसोई तक—महंगाई की दस्तक तेज।

∆ ECA लागू, लेकिन अखबारों में संकट नहीं, सिर्फ सरकारी आश्वासन की सुर्खियाँ।

∆ हेडलाइन मैनेजमेंट के दौर में असली संकट दबा—पत्रकारिता पर साख का सवाल।

∆ ऊर्जा संकट के संकेत साफ, फिर भी मीडिया में ‘आशावाद’ की खबरें हावी।

∆ जनता रसोई की आग से जूझ रही, अखबारों में प्रचार की चमक बरकरार।

“जब देश की सरहदों के बाहर उठती युद्ध की लपटें आम आदमी के चूल्हे तक पहुँच जाएँ, और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ‘सावधानी’ बरतने के नाम पर ‘सरकारी प्रवक्ता’ बन जाए, तो समझ लीजिए कि सूचना के बाजार में अब सिर्फ ‘सफेद झूठ’ और ‘गुलाबी प्रचार’ ही बिक रहा है।”

पश्चिम एशिया में युद्ध को अभी दो हफ्ते भी नहीं बीते हैं, लेकिन भारत की रसोई में ‘आंच’ महसूस होने लगी है। आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) का लागू होना इस बात की चीख-चीख कर तस्दीक कर रहा है कि संकट दहलीज पार कर चुका है। लेकिन विडंबना देखिए, अगले दिन के अखबारों ने जनता को यह बताने के बजाय कि आने वाले दिन कितने कठिन होंगे, सरकारी आश्वासनों और कसीदों को अपनी ‘लीड’ (मुख्य समाचार) बना लिया। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि ‘कॉरपोरेट पीआर’ और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का मिला-जुला रूप है।

आँकड़ों का मायाजाल और गायब वास्तविकता!

पुणे के गैस आधारित शवदाह गृहों का बंद होना और मुंबई के होटलों में सन्नाटा पसरना महज स्थानीय खबरें नहीं हैं; ये उस गहरे ऊर्जा संकट के शुरुआती लक्षण हैं जिसे दबाने की कोशिश की जा रही है। जब सरकार कहती है कि “घरेलू उपभोक्ताओं को निर्बाध आपूर्ति की जाएगी,” तो अखबार इसे बिना सवाल किए ‘सुर्खियों’ में सजाते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि अगर आयात ठप है और घरेलू स्टॉक का डेटा सार्वजनिक नहीं है, तो यह ‘निर्बाध’ वादा कितने दिनों का है? जनता को जागरूक करने का अर्थ यह था कि उन्हें खपत कम करने के सुझाव दिए जाते, बिजली के उपकरणों के उपयोग की सलाह दी जाती—लेकिन सरकार ने ‘मैनेजमेंट’ चुना और मीडिया ने उसका ‘प्रसारण’।

ट्रम्प का ‘आशावाद’ बनाम कड़वी कूटनीति!

कुछ अखबारों ने इसे “ट्रम्प के आने से युद्ध खत्म होगा” जैसे शीर्षकों के साथ पेश किया, जो पत्रकारिता के बजाय ज्योतिष विद्या के अधिक करीब लगता है। जब ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि “एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने देंगे,” तब ऐसे ‘झूठे आशावाद’ को परोसना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। सच्चाई यह है कि हवाई सफर महंगा हो चुका है, रसद की कीमतें बढ़ने वाली हैं, लेकिन अखबारों की प्राथमिकता में ‘मदुरै हवाई अड्डे का अंतरराष्ट्रीय बनना’ या ‘भविष्य के आवंटन’ की खबरें ऊपर हैं।

‘असुविधाजनक’ खबरों का निर्वासन!

लोकतंत्र के मंदिर में ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जैसी ऐतिहासिक घटना को सिंगल कॉलम में समेट देना या गायब कर देना यह बताता है कि मीडिया की साख किस रसातल में है। वहीं दूसरी ओर, जल जीवन मिशन के लिए भविष्य में किए जाने वाले 8.7 लाख करोड़ के ‘संभावित’ आवंटन को ऐसी प्रमुखता दी जाती है जैसे ग्रामीण भारत के हर नल में आज ही गंगा उतर आई हो। इंदौर में गंदा पानी पीने से हुई मौतों की खबर इस चमक-धमक वाले प्रचार के नीचे कहीं दम तोड़ देती है।

बंगाल का ‘SIR’ और अदालती दखल: एक मौन षड्यंत्र!

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर 50 लाख मतदाताओं का लिस्ट से बाहर होना एक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी खबर होनी चाहिए थी। चुनाव आयोग का इस कार्य को अपना विशेषाधिकार बताना और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व जजों के ट्रिब्यूनल बनाने का आदेश देना, चुनावी शुचिता पर गहरे सवाल खड़ा करता है। लेकिन ‘घुसपैठियों की पहचान’ के शोर में ‘डिजिटल विसंगति’ के कारण बेदखल हुए लाखों नागरिकों का दर्द मीडिया के शोरूम में जगह नहीं पा सका।

साख का संकट

आज के अखबारों को पढ़कर ऐसा लगता है मानो वे जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए छप रहे हैं कि जनता के मन में कोई सवाल ही न उठे। जब संवैधानिक संस्थाओं की साख दांव पर हो, तब अखबारों का यह ‘सुरक्षित खेल’ लोकतंत्र के लिए सबसे घातक है। रेत में सिर छिपाने से तूफान नहीं टलता, और सरकारी विज्ञप्तियों को लीड बनाने से रसोई की महंगाई कम नहीं होती।

“जनता ‘हकीकत’ की तलाश में पन्ने पलट रही है और डिजिटल व अखबार से लेकर टी वी चैनल तक उन्हें ‘आश्वासनों’ की घुट्टी पिला रहे हैं; याद रहे, जब खबरों का ‘अकाल’ पड़ता है, तभी प्रोपेगेंडा की ‘फसल’ लहलहाती है।”

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