कुशीनगर : दो पर निर्देश, एक पर कार्रवाई, कुशीनगर में परीक्षा प्रकरण ने उठाए नए सवाल।

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धनंजय कुमार पाण्डेय, आपकी आवाज़ न्यूज़, कुशीनगर

∆ 700 छात्रों के भविष्य से खिलवाड़, जिम्मेदारी तय करने में असमानता क्यों?

∆ निदेशालय का आदेश दोनों पर, कार्रवाई सिर्फ एक पर — क्या है वजह?

∆ कुशीनगर डीआईओएस कार्यालय की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल!

∆ बिना नोटिस निलंबन पर विधि विशेषज्ञों ने जताई गंभीर आपत्ति!

∆ प्रक्रियात्मक चूक या सुनियोजित रणनीति? शिक्षा महकमे में चर्चा तेज!

पडरौना : कुशीनगर 19 फरवरी
📌 मामले की पृष्ठभूमि – पडरौना स्थित गोस्वामी तुलसीदास इंटर कॉलेज के लगभग 700 पत्राचार परीक्षार्थियों को परीक्षा से वंचित किए जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस प्रकरण में विभागीय कार्रवाई ने नए विवाद को जन्म दे दिया है।

📌 आदेश बनाम कार्रवाई
पत्राचार शिक्षा संस्थान, प्रयागराज के अपर शिक्षा निदेशक द्वारा जारी निर्देश में नोडल अधिकारी और प्रधान लिपिक — दोनों के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 के तहत मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई थी।
हालांकि, जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा केवल प्रधान लिपिक पर कार्रवाई की गई, जबकि नोडल अधिकारी पर अब तक ठोस कदम सामने नहीं आया।

📌 डीआईओएस कुशीनगर की जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल!
जानकारों का कहना है कि परीक्षा आवेदन पत्र अंतिम रूप से डीआईओएस कार्यालय के माध्यम से ही बोर्ड को प्रेषित होते हैं। ऐसे में 700 आवेदन पत्रों में त्रुटि होना कई स्तरों पर निगरानी की कमी को दर्शाता है।
यदि जांच हुई थी तो खामियां पकड़ी क्यों नहीं गईं? और यदि नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? यह सवाल लगातार उठ रहा है।

📌 निलंबन प्रक्रिया पर कानूनी बहस!
विधि विशेषज्ञों का मत है कि सेवा नियमों के अनुसार सामान्यतः निलंबन से पूर्व कारण बताओ नोटिस और स्पष्टीकरण लिया जाना अपेक्षित होता है। यदि इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो न्यायिक स्तर पर चुनौती संभव है।

📌 क्या हो सकती थी उचित कार्रवाई!
विभागीय सूत्रों के अनुसार, आदेश के अनुपालन में दोनों संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विधिवत तहरीर देकर मुकदमा दर्ज कराया जाना चाहिए था। इसके बाद नियमानुसार नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण लेकर ही निलंबन की कार्रवाई की संस्तुति की जानी चाहिए थी।

📌 ईतना होने के बावजूद भी भविष्य अधर में!
पूरे घटनाक्रम में 700 छात्रों का भविष्य सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है। जिम्मेदारी तय करने और निष्पक्ष जांच की मांग तेज होती जा रही है।

∆ एकतरफा कार्रवाई पर घिरा डीआईओएस कार्यालय, कार्यशैली पर उठे सवाल!

कुशीनगर में 700 पत्राचार परीक्षार्थियों को परीक्षा से वंचित किए जाने के मामले में जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) की कार्यशैली अब बहस के केंद्र में आ गई है। आरोप है कि निदेशालय के स्पष्ट निर्देश के बावजूद नोडल अधिकारी और प्रधान लिपिक — दोनों पर समान रूप से कार्रवाई करने के बजाय केवल प्रधान लिपिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया और निलंबन की संस्तुति कर दी गई, वह भी बिना कारण बताओ नोटिस और बिना स्पष्टीकरण मांगे।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पत्राचार शिक्षा संस्थान, प्रयागराज के अपर शिक्षा निदेशक द्वारा जारी आदेश में दोनों जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम-2024 के तहत अभियोग पंजीकृत कराने का स्पष्ट उल्लेख था। इसके बावजूद कार्रवाई एक व्यक्ति तक सीमित रहना विभागीय निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में निलंबन से पूर्व संबंधित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण लेने की परंपरा है, विशेषकर तब जब मामला जांचाधीन हो। यदि यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, तो आगे चलकर न्यायिक चुनौती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब आवेदन पत्र जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय के माध्यम से बोर्ड तक प्रेषित होते हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में त्रुटिपूर्ण प्रपत्रों की जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी पर कैसे तय कर दी गई? क्या बहु-स्तरीय जांच प्रक्रिया में कहीं और चूक नहीं हुई?
“जब आदेश दोनों पर कार्रवाई का हो, तो एकतरफा कदम पारदर्शिता नहीं बल्कि पक्षपात की आशंका को जन्म देता है।”
शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का मानना है कि यदि निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाता, तो पहले दोनों संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विधिवत तहरीर दी जाती, तत्पश्चात नियमानुसार नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण लिया जाता और उसके बाद ही निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई पर निर्णय होता।
वर्तमान परिस्थितियों में जिला विद्यालय निरीक्षक कुशीनगर की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि उच्चाधिकारियों द्वारा पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कर स्पष्टता लाई जाती है या नहीं, क्योंकि अंततः इस प्रशासनिक विवाद के बीच सबसे बड़ा नुकसान 700 छात्रों के भविष्य को हुआ है।

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