बड़ी खबर/बांस बायोचार से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार : कुशीनगर के शैलेष यादव का शोध अंतरराष्ट्रीय मंच पर चयनित।

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धनंजय कुमार पाण्डेय, व्यूरो चीफ, उत्तर प्रदेश

🟢 कुशीनगर का गौरव!
आईआईटी पटना के शोधकर्ता शैलेष यादव का बांस बायोचार पर शोध ASCE अमेरिका में प्रकाशित — भारत के लिए गर्व का क्षण!
🔵 बांस बायोचार से मिट्टी हुई समृद्ध, शोध में खुलासा — बांस बायोचार मिट्टी की जल-धारण क्षमता और गुणवत्ता में लाता है अभूतपूर्व सुधार!
🟣 लैंडफिल कवर में नई उम्मीद – बायोचार तकनीक से अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में मिलेगा नया समाधान!
🟡 ग्रामीण युवा ने बढ़ाया देश का मान – कुशीनगर के शैलेष यादव की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि से परिवार और गांव में छाया जश्न!
🔴 विश्व में भारत की वैज्ञानिक पहचान
ASCE जैसी प्रतिष्ठित संस्था में भारतीय शोध का चयन — सतत विकास की दिशा में बड़ा कदम!

कुशीनगर। जनपद के रामकोला विकास खंड के ग्राम सिधावें पठान पट्टी निवासी भगवन्त यादव के पुत्र शैलेष कुमार यादव ने अपने उत्कृष्ट शोध कार्य से जिले के साथ-साथ देश का नाम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है।
आईआईटी पटना में भूविज्ञान एवं पर्यावरण संरक्षण पर शोधरत शैलेष का शोध पत्र विश्व प्रसिद्ध संस्था अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनियर्स (ASCE) की अंतरराष्ट्रीय डिजिटल पब्लिकेशन में चयनित कर प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन जर्नल ऑफ मैटेरियल्स इन सिविल इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुआ है, जो भारत के लिए गौरव का विषय है।

🟢 शोध का विषय : “बांस बायोचार से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार”

शैलेष कुमार यादव और उनके सह-शोधकर्ता डॉ. रामकृष्ण बाग ने इस अध्ययन में बांस से तैयार बायोचार के उपयोग पर गहन अनुसंधान किया। उन्होंने पाया कि बांस बायोचार मिट्टी की जल-धारण क्षमता और संपीड़नशीलता (compressibility) में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
शोध में यह भी निष्कर्ष निकला कि यह पदार्थ मिट्टी की हाइड्रोलिक कंडक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है, जिससे यह लैंडफिल कवर (कचरा निस्तारण स्थलों की ऊपरी परत) में उपयोग के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

🔵 वैश्विक स्तर पर उपयोग की संभावना!

यह अध्ययन केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के उन देशों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है जहाँ बांस की खेती और बायोचार उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बांस बायोचार का उपयोग निम्न परिस्थितियों वाले देशों में विशेष रूप से लाभकारी रहेगा—

1. उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु वाले देश, जहाँ बांस की खेती व्यापक रूप से होती है।

2. कमजोर मिट्टी वाले क्षेत्र, जहाँ जल धारण क्षमता और उपजाऊपन कम है।

3. अपशिष्ट प्रबंधन और लैंडफिल कवर से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे देश।

इन श्रेणियों में भारत, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, ब्राजील, मेक्सिको और कुछ अफ्रीकी देश प्रमुख रूप से शामिल हैं।

🟣 परिवार और क्षेत्र में खुशी की लहर!

शैलेष कुमार यादव ने जब अपने इस अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि की जानकारी दूरभाष के माध्यम से अपने परिवार को दी, तो पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ गई। माता-पिता, परिजनों एवं ग्रामीणों ने इसे कुशीनगर के लिए गर्व का क्षण बताया।

🟡 शोध का संभावित प्रभाव!

विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध कृषि विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण दोनों क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
बांस बायोचार न केवल मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने में मददगार होगा बल्कि यह सतत विकास (Sustainable Development) की दिशा में एक बड़ा कदम भी साबित हो सकता है।

संपादकीय टिप्पणी:
कुशीनगर के युवा वैज्ञानिक शैलेष यादव ने यह साबित कर दिया है कि, ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकला प्रतिभाशाली युवक भी अपने परिश्रम और ज्ञान से विश्व मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।
ASCE जैसी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा भारतीय शोध का चयन और प्रकाशन भारत की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

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