नई दिल्ली : डिजिटल की चमक और नकदी का अभेद्य साम्राज्य वर्तमान भारत की स्थिति।

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डेस्क, आपकी आवाज़ न्यूज़, नई दिल्ली

√ स्कैनर की बीप बनाम तिजोरी की खनक: डिजिटल भुगतान बढ़ा, भरोसा अब भी नकद पर!

√ UPI से छोटी खरीद आसान, लेकिन बड़े सौदे अब भी कैश के सहारे!

√ डिजिटल ट्रेल का डर: प्राइवेसी और टैक्स की चिंता से कैश की पकड़ मजबूत!

√ असंगठित अर्थव्यवस्था की धड़कन: मजदूरी से मंडी तक नकद का दबदबा!

√ ₹40 लाख करोड़ का सच: डिजिटल चमक के पीछे नकदी का अघोषित साम्राज्य!

पंडित प्रदीप शुक्ल की कलम से…

विश्लेषण : ₹40 लाख करोड़ का रहस्य

डिजिटल क्रांति के शोर के बीच यह आंकड़ा चौंकाने वाला नहीं, बल्कि सचेत करने वाला है। 2016 में नोटबंदी का एक बड़ा लक्ष्य ‘लेस-कैश’ अर्थव्यवस्था बनाना था, लेकिन 2026 तक आते-आते नकद का दोगुना (₹40 लाख करोड़ से अधिक) हो जाना यह साबित करता है कि सुविधा (Convenience) और भरोसा (Trust) दो अलग ध्रुव हैं।

  1. ‘छोटा भुगतान डिजिटल, बड़ा लेन-देन नकद’
    UPI ने चाय, सब्जी और ऑटो जैसे सूक्ष्म भुगतानों पर कब्ज़ा कर लिया है, जिसे हम ‘Medium of Exchange’ कहते हैं। लेकिन जब बात ‘Store of Value’ की आती है, तो भारतीय जनमानस आज भी भौतिक नकदी पर ही यकीन करता है। संपत्तियों के बड़े सौदे, शादियाँ और अनौपचारिक व्यापारिक लेन-देन आज भी भारी भरकम कैश के बिना अधूरे हैं।
  2. अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) की मज़बूरी और मर्जी
    भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आज भी असंगठित है। कृषि उत्पादों की खरीद-फरोख्त से लेकर निर्माण कार्य में लगे मजदूरों की दिहाड़ी तक, नकद ही एकमात्र सुलभ जरिया है। बैंकिंग नेटवर्क की पहुँच और डिजिटल साक्षरता बढ़ने के बावजूद, ‘कैश ऑन हैंड’ को आज भी सबसे बड़ी सुरक्षा माना जाता है।
  3. डेटा की निगरानी और ‘प्राइवेसी’ का डर
    जैसे-जैसे डिजिटल फुटप्रिंट बढ़ रहे हैं, प्राइवेसी को लेकर भी सजगता बढ़ी है। एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अपनी हर छोटी-बड़ी गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड (Trail) छोड़ने से कतराता है। टैक्स की जटिलताओं और सरकारी निगरानी से बचने के लिए ‘नकद’ एक सुरक्षित शरणस्थली बना हुआ है।
  4. चुनाव और नकद का अटूट रिश्ता
    लोकतंत्र के महापर्व में नकद की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। चुनावी मौसम में जिस तरह से कैश का प्रवाह बढ़ता है और रिकॉर्ड बरामदगी होती है, वह इस ₹40 लाख करोड़ के एक बड़े हिस्से की कहानी खुद-ब-खुद बयां कर देता है।

डिजिटल इंडिया एक आधुनिक आवरण है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था की धड़कनें आज भी पारंपरिक हैं। हम एक ऐसे ‘हाइब्रिड’ दौर में पहुँच गए हैं जहाँ दिखावा डिजिटल है, लेकिन आधार नकद है। ₹500 के नोटों की बढ़ती संख्या साफ इशारा करती है कि यह पैसा केवल बाजार में घूम नहीं रहा, बल्कि घरों और व्यापारिक ठिकानों में ‘जमा’ है।

“QR कोड ने हमारी जेबें भले ही हल्की कर दी हों, लेकिन अलमारियों का वजन आज भी उस कागज़ से तय होता है जिस पर ‘गवर्नर’ के हस्ताक्षर होते हैं।”

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