“प्रिंट की चुप्पी और डिजिटल का शोर: आम आदमी की खबर आखिर कहाँ खो गई?”

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डेस्क, आपकी आवाज़ न्यूज़

∆ प्रिंट की खामोशी और डिजिटल का शोर—आम आदमी की खबर आखिर कहाँ खो गई?

∆ सरकारी विज्ञापनों के दबाव में प्रिंट, क्लिकबेट की दौड़ में डिजिटल—साख पर बड़ा संकट।

∆ वॉचडॉग से लैपडॉग बना प्रिंट मीडिया, ट्रैफिक की भूख में भटका डिजिटल प्लेटफॉर्म।

∆ हेडलाइन मैनेजमेंट के दौर में सच्ची खबरें हाशिए पर, नैरेटिव बन रही नई ‘न्यूज’।

∆ विश्वसनीयता के संकट में मीडिया—जनता के सामने सच और शोर में फर्क करना मुश्किल।

डिजिटल डेस्क |प्रदीप शुक्ल की कलम से…!
देश का सूचना तंत्र इस समय गंभीर विश्वसनीयता संकट से गुजर रहा है। एक ओर पारंपरिक प्रिंट मीडिया है, जिसकी साख कभी निष्पक्ष और मजबूत पत्रकारिता की पहचान मानी जाती थी, लेकिन अब उस पर सरकारी विज्ञापनों और ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ का दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर तेजी से बढ़ता डिजिटल मीडिया है, जहाँ खबरों की जगह अक्सर सनसनी, गालियों और क्लिकबेट का बोलबाला दिखाई देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति ने आम नागरिक के सामने एक ‘विश्वसनीयता का अंतराल’ पैदा कर दिया है। लोग अखबार पढ़ते समय यह सोचने लगे हैं कि खबर के पीछे कहीं कोई राजनीतिक या विज्ञापन आधारित एजेंडा तो नहीं है। वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई स्वयंभू पत्रकार और पोर्टल ट्रैफिक बढ़ाने के लिए विवादित और भड़काऊ सामग्री परोसते नजर आते हैं।

“जब अखबारों की स्याही सत्ता के ‘अभयदान’ की मोहताज हो जाए और डिजिटल स्क्रीन ‘व्यूज’ की हवस में अंधी हो जाए, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र की धड़कन—अर्थात् ‘सत्य’—अब आईसीयू (ICU) में है।”

आज का भारतीय सूचना तंत्र दो पाटों के बीच पिस रहा है। एक तरफ वह पारंपरिक ‘प्रिंट मीडिया’ है जिसकी साख कभी पत्थर की लकीर मानी जाती थी, लेकिन अब वह सरकारी विज्ञापनों और ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ के बोझ तले दम तोड़ रहा है। दूसरी तरफ ‘डिजिटल मीडिया’ का वह अनियंत्रित समंदर है जहाँ सूचना से ज्यादा शोर और तथ्यों से ज्यादा नफरत बिक रही है। इन दोनों के बीच जो ‘विश्वसनीयता का अंतराल’ (Credibility Gap) पैदा हुआ है, उसने आम नागरिक को एक ऐसे ‘सूचना शून्य’ (Information Vacuum) में धकेल दिया है जहाँ उसे समझ नहीं आता कि वह किस पर यकीन करे।

∆ प्रिंट मीडिया: ‘वॉचडॉग’ से ‘लैपडॉग’ तक का सफर!

पश्चिम एशिया के संकट और देश में लागू ‘ईसीए’ (ECA) के उदाहरण से यह साफ है कि प्रिंट मीडिया अब ‘सत्ता को आईना’ दिखाने के बजाय ‘सत्ता का चश्मा’ पहनने लगा है। अखबारों का काम यह था कि वे बताते कि अगर ईरान ने तेल रोका तो भारत के रणनीतिक भंडार कितने दिन चलेंगे। लेकिन उन्होंने क्या बताया? उन्होंने सरकार के ‘प्राथमिकता तय करने’ के प्रशासनिक आदेश को एक महान उपलब्धि की तरह छापा। यह ‘सेंसॉरशिप’ नहीं है, यह उससे भी घातक ‘सेल्फ-सेंसॉरशिप’ है, जहाँ संपादक खुद ही तय कर लेता है कि कौन सी खबर ‘साहब’ को नाराज कर सकती है।

∆ डिजिटल मीडिया: गालियाँ, गुस्सा और ‘क्लिकबेट’ का खेल!

प्रिंट से निराश होकर जनता जब डिजिटल की ओर मुड़ती है, तो वहाँ का हाल और भी बुरा है। वहाँ पत्रकारिता का आधार ‘साख’ नहीं बल्कि ‘ट्रैफ़िक’ है। जैसा कि हमने देखा, कुछ तथाकथित डिजिटल योद्धा गालियों को ‘इन्वेस्टमेंट’ मानते हैं। उनके लिए खबर का मतलब शोध या रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि ऐसी गॉसिप परोसना है जो कमेंट बॉक्स में आग लगा दे। डिजिटल माध्यमों ने सूचना का ‘लोकतांत्रिकरण’ तो किया, लेकिन साथ ही ‘सत्य की हत्या’ को भी एक मुनाफे वाला बिजनेस बना दिया।

∆ ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ और सूचना का अकाल!

आज की सरकारें ‘न्यूज’ नहीं बल्कि ‘नैरेटिव’ चलाती हैं। जल जीवन मिशन के लिए अरबों के आवंटन की खबर पहले पन्ने पर इसलिए है क्योंकि वह एक ‘सुखद भविष्य’ का सपना बेचती है। वहीं इंदौर में गंदा पानी पीने से हुई मौतें या बंगाल में मतदाता सूची से 50 लाख नामों का गायब होना इसलिए हाशिए पर हैं क्योंकि वे ‘वर्तमान की विफलता’ का प्रमाण हैं। जब विज्ञापनदाताओं का दबाव संपादकीय विवेक पर हावी हो जाए, तो ‘अविश्वास प्रस्ताव’ जैसी ऐतिहासिक खबरें भी सिंगल कॉलम में दम तोड़ देती हैं।

∆ साख का संकट: लोकतंत्र की अंतिम सांस!

किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा तब होता है जब उसकी जनता अपनी मुख्यधारा की मीडिया पर विश्वास करना बंद कर दे। आज जब लोग अखबार उठाते हैं, तो वे खबर नहीं, बल्कि यह ढूंढते हैं कि सरकार ने आज क्या ‘बेचा’ है। और जब वे मोबाइल खोलते हैं, तो वे यह ढूंढते हैं कि किस ‘स्वयंभू’ पत्रकार ने आज किसे सबसे ज्यादा कोसा है। इस प्रक्रिया में ‘तथ्य’ कहीं खो गए हैं।

∆ पुनर्जागरण की जरूरत!

पत्रकारिता का यह ‘रिवर्स गियर’ (Reverse Gear) समाज को एक अंधी गली में ले जा रहा है। यदि प्रिंट मीडिया ने अपनी रीढ़ सीधी नहीं की और डिजिटल मीडिया ने अपनी मर्यादा तय नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘खबर’ केवल एक मनोरंजन का साधन बनकर रह जाएगी। लोकतंत्र को बचाने के लिए जरूरी है कि पत्रकारिता ‘सत्ता के गलियारों’ से निकलकर फिर से ‘जनता की चौखट’ पर वापस आए।

“प्रिंट/टीवी बिक चुका है, डिजिटल बहक चुका है; और सच्चाई? वह आज भी गलियों में नंगी घूम रही है, बस उसे ‘कवर’ करने वाली साख अब मर चुकी है।”

मीडिया विश्लेषकों के अनुसार पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना और समाज की वास्तविक समस्याओं को सामने लाना होता है। लेकिन आज कई जगहों पर यह उद्देश्य पीछे छूटता दिखाई देता है। ‘नैरेटिव’ आधारित खबरें और प्रचारात्मक सामग्री अक्सर प्रमुख स्थान पर दिखती हैं, जबकि जमीनी समस्याएँ और जनहित के मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मीडिया संस्थान अपनी विश्वसनीयता और मर्यादा को फिर से स्थापित नहीं करते, तो लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से जनता के मुद्दों को केंद्र में रखकर निष्पक्ष और जिम्मेदार रिपोर्टिंग की दिशा में आगे बढ़े।

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