कुशीनगर : सुभाष यादव फर्जी नियुक्ति मामला पहुंचा अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा एंव माध्यमिक शिक्षा के सामने।

0
image_editor_output_image534855025-1765525565260.png
Spread the love

धनंजय कुमार पाण्डेय, व्यूरो चीफ, उत्तर प्रदेश

🔴 भ्रष्टाचार अन्वेषण एंव मानवाधिकार परिषद ने अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा एंव माध्यमिक शिक्षा उत्तर प्रदेश शासन से की शिकायत

🔴 भ्रष्टाचार अन्वेषण एवं मानवाधिकार परिषद ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग।

∆ “सुभाष यादव की संदिग्ध नियुक्ति पर उठे बड़े सवाल—मामला पहुँचा अपर मुख्य सचिव तक!”

∆ “कूटरचित दस्तावेज़ों से नौकरी और पदोन्नति? मानवाधिकार परिषद ने मांगी उच्चस्तरीय जांच”।

∆ “परियोजना खत्म, कर्मचारी हटे—तो फिर कैसे बने सुभाष बेसिक विभाग के परिचारक?”

∆ “तीन दशक से डीआईओएस में डेरा… क्या फर्जी नियुक्ति और पदोन्नति का बड़ा खेल?”

कुशीनगर। डीआईओएस कार्यालय में तैनात वरिष्ठ लिपिक सुभाष प्रसाद यादव की कथित फर्जी नियुक्ति और नियम विरुद्ध पदोन्नतियों का मामला अब शासन स्तर तक पहुँच गया है। भ्रष्टाचार अन्वेषण एवं मानवाधिकार परिषद ने अपर मुख्य सचिव, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन से इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।

परिषद का आरोप है कि सुभाष प्रसाद यादव ने कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल की और बाद में विभाग के भीतर मनमाने तरीके से पदोन्नतियाँ प्राप्त कीं। शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि वे बिना स्वीकृत पद के वर्षों से डीआईओएस कार्यालय में जमे हुए हैं।

∆ वर्ष 1989 की नियुक्ति पर उठ रहे सवाल!
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुभाष यादव की नियुक्ति 6 अक्टूबर 1989 को तत्कालीन देवरिया जनपद के अंतर्गत कसया विकास खंड में अनौपचारिक शिक्षा परियोजना के अंतर्गत ‘परिचारक’ के पद पर हुई थी। आरोप है कि उस समय परियोजना में कार्यरत एक अधिकारी, जो सुभाष के रिश्तेदार बताए जाते हैं, ने प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्हें नियुक्त कराया।

वे 16 अप्रैल 2001 तक लगभग 11 वर्ष 6 माह परिचारक पद पर कार्यरत रहे। बाद में अनौपचारिक शिक्षा परियोजना को सरकार ने समाप्त कर दिया था।
परियोजना बंद होने पर अनुदेशकों को सर्व शिक्षा अभियान में समायोजित किया गया, जबकि चतुर्थ श्रेणी कर्मियों, जिनमें परिचारक शामिल थे, की सेवाएँ समाप्त कर दी गई थीं। पूर्व अनौपचारिक शिक्षा अनुदेशकों—महेश कुमार, रामनरेश भारती और सूर्य प्रकाश—ने इसकी पुष्टि की है।

∆ परिषद ने उठाए गंभीर प्रश्न!
शिकायत में परिषद ने कहा है कि जब संबंधित परियोजना ही समाप्त हो गई, तो फिर सुभाष यादव स्वतः बेसिक शिक्षा विभाग में परिचारक कैसे बन गए?
कौन सा शासनादेश जारी हुआ, किस अधिकारी ने उन्हें अनौपचारिक शिक्षा के परिचारक पद से हटाकर बेसिक विभाग में स्थानांतरित कर दिया, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

इसके बावजूद सुभाष यादव न केवल बेसिक विभाग में कार्यरत रहे, बल्कि बाद में पदोन्नति पाकर डीआईओएस कार्यालय में वरिष्ठ लिपिक के पद तक पहुँच गए। परिषद ने इस पर गहरी शंका व्यक्त करते हुए कहा कि यदि उनकी तैनाती और पदोन्नतियाँ नियमों के विपरीत पाई गईं, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक अनियमितता और संभावित फर्जीवाड़े का मामला बनता है।

∆ तीन दशक से सेवा पर भी उठे सवाल!
शिकायतकर्ताओं ने यह भी उल्लेख किया है कि सुभाष यादव लगभग 30 वर्षों से कुशीनगर में बीएसए, डायट और डीआईओएस जैसे महत्वपूर्ण शिक्षा कार्यालयों में लगातार तैनात रहे हैं, जो अपने आप में प्रशासनिक दृष्टि से असामान्य है।

परिषद ने अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा को भेजे गए पत्र में सभी संबंधित साक्ष्य उपलब्ध कराते हुए इस विषय में त्वरित, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, ताकि वास्तविकता सामने आ सके और आवश्यक कार्रवाई हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed