बड़ी खबर : योगी सरकार में सुभाष यादव की नियुक्ति पर सवाल: परियोजना बंद होने के बाद भी नौकरी जारी, जांच की मांग तेज।

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धनंजय कुमार पाण्डेय, व्यूरो चीफ, उत्तर प्रदेश

🔵 परियोजना खत्म, कर्मचारी बाहर… तो सुभाष यादव अंदर कैसे? शिक्षा विभाग की चुप्पी और गहरी साजिश की बू!

🔵 बिना शासनादेश बेसिक विभाग में समायोजन! क्या शिक्षा विभाग में ‘फेवर’ ही नियम है और नियम सिर्फ कागज़ों पर?

🔵 परिचारक से लिपिक—वह भी बिना पद के! शिक्षा विभाग में “पदोन्नति या हेराफेरी”? जांच से ही सच बाहर आएगा!

🔵 योजना खत्म, पद खत्म… पर नौकरी जारी! शिक्षा विभाग बताए—सुभाष का जादू काम किया या विभाग ने आंखें बंद कर लीं?

🔵 गायब शासनादेश, संदिग्ध समायोजन और विभागीय खामोशी—कहीं शिक्षा विभाग में फर्जी नियुक्तियों का ‘सिंडिकेट’ तो नहीं?

🔴 कुशीनगर में योगी सरकार के “जीरो टॉलरेंस नीति” की जम कर उड़ रही धज्जियां।

कुशीनगर : जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कार्यालय में तैनात कनिष्ठ लिपिक सुभाष प्रसाद यादव की सेवा-यात्रा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। आरोप है कि अनौपचारिक शिक्षा परियोजना के परिचारक पद से सेवा शुरू करने वाले सुभाष, परियोजना समाप्त होने के बाद भी न सिर्फ नौकरी में बने रहे, बल्कि बाद में बेसिक शिक्षा विभाग में समायोजन और पदोन्नति का लाभ भी ले लिया। मामला अब गहन जांच की मांग करने लगा है, क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों और सरकारी व्यवस्थाओं के बीच कई विसंगतियां सामने आ रही हैं।

🔵 अनौपचारिक शिक्षा परियोजना से बेसिक विभाग तक: कई अनुत्तरित सवाल!

प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सुभाष प्रसाद यादव की नियुक्ति 6 अक्टूबर 1989 को अनौपचारिक शिक्षा परियोजना के अंतर्गत कसया विकासखंड में परिचारक के रूप में हुई थी। उस समय कुशीनगर, देवरिया जनपद का हिस्सा था। सूत्रों के मुताबिक उस दौर में परियोजना अधिकारी से उनके पारिवारिक संबंध होने की वजह से सुभाष को नौकरी मिली थी।

ज्ञात रहे कि अनौपचारिक शिक्षा परियोजना की शुरुआत वर्ष 1985-86 में स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से की गई थी। यह योजना वर्ष 1999 में बंद कर दी गई। इस दौरान अनुदेशकों को आगे चलकर सर्व शिक्षा अभियान में समाहित किया गया, लेकिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं।

इसके बावजूद आरोप है कि परियोजना 1999 में समाप्त होने के बावजूद सुभाष 16 अप्रैल 2001 तक परिचारक के रूप में कार्यरत रहे—यह स्थिति अपने आप में सवाल खड़े करती है। जानकारों का कहना है कि परियोजना के बंद होने के बाद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का कहीं भी समायोजन संभव नहीं था।

🔴 बेसिक शिक्षा विभाग में समायोजन—किस आदेश के तहत?

सबसे बड़ा विवादित बिंदु यह है कि 16 अप्रैल 2001 को सुभाष यादव सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय, कसया में परिचारक के पद पर तैनात हो गए। जबकि उस समय न तो कोई आधिकारिक शासनादेश उपलब्ध बताया जाता है, न ही किसी स्पष्ट प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है।

∆ जानकारों का दावा है कि:

परियोजना समाप्ति के बाद परिचारकों के समायोजन पर कोई शासनादेश अस्तित्व में नहीं है

बेसिक विभाग में सुभाष का समायोजन संदिग्ध प्रतीत होता है

यदि शासनादेश मौजूद था, तो यह क्यों सार्वजनिक नहीं हुआ?

2001 से 2018 तक 17 वर्ष 2 माह तक एक ही कार्यालय में कार्यरत रहना भी प्रश्नों को जन्म देता है

इसमें भी चर्चाएं हैं कि सुभाष प्रसाद यादव को बाद में कनिष्ठ लिपिक के रूप में पदोन्नति देकर DIOS कार्यालय में समायोजित कर दिया गया—वह भी बिना स्वीकृत पद के।

🔵 सुभाष यादव का पक्ष—“मेरी नियुक्ति वैध है”

जब इस संबंध में सुभाष प्रसाद यादव से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा—

“मेरी नियुक्ति पूरी तरह वैध है। परियोजना बंद होने के बाद एडी बेसिक ने कई लोगों का समायोजन किया था, उसी क्रम में मेरा भी हुआ है।”

लेकिन जब उनसे यह पूछा गया कि परिचारक को बेसिक विभाग में समायोजन से संबंधित शासनादेश कौन-सा है, तो वह कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके। उनका जवाब था—

“शासनादेश विभाग के पास होगा।”

उनका यह अस्पष्ट उत्तर कई नई शंकाओं को जन्म देता है।

🔴 जांच की जरूरत क्यों?

पूरे प्रकरण में कई तथ्य असंगत दिखाई देते हैं:

समाप्त हो चुकी परियोजना में 2001 तक कार्यरत रहना

चतुर्थ श्रेणी कर्मियों का समायोजन न होना, फिर भी नौकरी जारी रहना

बेसिक विभाग में समायोजन का कोई दस्तावेज उपलब्ध न होना

बिना स्वीकृत पद के DIOS कार्यालय में पदोन्नति पाना


इन सभी पहलुओं की वजह से यह मामला गंभीर जांच का विषय बन चुका है। शिक्षा विभाग में अंदरूनी गड़बड़ियों की ओर यह घटना संकेत करती है, जिसे अनदेखा करना प्रशासन के लिए कठिन होगा।

सुभाष यादव की नियुक्ति से लेकर समायोजन और पदोन्नति तक की कहानी प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर बड़े सवाल खड़े करती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल विभागीय चूक मानी जाएगी, बल्कि गहरी जांच और कार्रवाई की भी मांग उठ सकती है।
जनहित और शिक्षा विभाग की पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष जांच अब आवश्यक प्रतीत होती है।

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