बड़ी खबर/कुशीनगर डीआईओएस कार्यालय में भ्रष्टाचार की गंध: बिना पद के पदोन्नति ने खोली प्रणाली की पोल।
धनंजय कुमार पाण्डेय, व्यूरो चीफ, उत्तर प्रदेश
🟥 1️⃣ “पद ही नहीं, फिर भी पदोन्नति — डीआईओएस दफ्तर में चमत्कार या मिलीभगत?”
बिना सृजित पद के पदोन्नति ने कुशीनगर के शिक्षा विभाग की व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
🟡 2️⃣ “कागज़ों में खेल, कुर्सी पर कब्ज़ा — सिस्टम की लापरवाही या साजिश?”
जिन अधिकारियों की निगरानी में यह फाइल पास हुई, वे खुद जांच के दायरे में आ गए हैं।
🔴 3️⃣ “डीआईओएस कार्यालय में पदोन्नति नहीं, ‘प्रबंधन की राजनीति’ चली!”
जानकार बोले — सुभाष यादव का प्रमोशन नियमों की नहीं, रसूख की देन है।
🔵 4️⃣ “वरिष्ठ सहायक का पद सृजित ही नहीं — फिर तीन साल से किस आदेश पर वेतन?”
वित्तीय अनियमितता के सवालों पर विभाग ने साधी चुप्पी।
🟣 5️⃣ “26 वर्षों से कुशीनगर में जमे रहना — क्या डीआईओएस कार्यालय बना निजी जागीर?”
शासनादेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए सुभाष यादव लगातार एक ही जिले में डटे हुए हैं।
🟠 6️⃣ “डीआईओएस से लेकर लेखाधिकारी तक की भूमिका संदिग्ध — किसने दी फाइल को हरी झंडी?”
पदोन्नति फाइल के हर दस्तख़त पर अब उठ रहे हैं सवाल।
🟢 7️⃣ “बिना पदोन्नति आदेश की वैधता जांचे, वेतन आहरण — क्या यह राजकोषीय अपराध नहीं?”
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की साफ़ मिसाल है।
⚫ 8️⃣ “नियमों का गला घोंटकर प्रमोशन — कुशीनगर डीआईओएस दफ्तर में ‘पद बेइमानी’ का खेल उजागर!”
शिक्षा विभाग की साख पर सवाल; निष्पक्ष जांच ही कर सकती है दूध का दूध, पानी का पानी।

कुशीनगर। यह खबर किसी अफवाह या अंदेशे पर आधारित नहीं, बल्कि उस सच पर टिकी है जो जिले के शिक्षा प्रशासन की जड़ों में पसरे भ्रष्टाचार को उजागर करता है। जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय, कुशीनगर में बिना सृजित पद के वरिष्ठ सहायक के पद पर की गई सुभाष प्रसाद यादव की पदोन्नति ने पूरी प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
🟡 नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पदोन्नति की गाथा!
सूत्रों के अनुसार, डीआईओएस कार्यालय कुशीनगर में वरिष्ठ सहायक का कोई पद सृजित ही नहीं है। बावजूद इसके, वर्ष 2022 में कनिष्ठ सहायक सुभाष प्रसाद यादव को उसी कार्यालय में वरिष्ठ सहायक के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। सवाल यह उठता है कि
“जब पद ही नहीं था, तो पदोन्नति कैसे संभव हुई?”
यह सवाल न सिर्फ गंभीर है, बल्कि पूरी पदोन्नति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगाता है।
🔵 डीआईओएस कार्यालय की वास्तविक संरचना!
जनपद सृजन के बाद से डीआईओएस कार्यालय में कुल 9 पद स्वीकृत हैं — जिनमें डीआईओएस, लेखाधिकारी, एक आशुलिपिक, एक लेखाकार, एक कनिष्ठ लिपिक, एक दफ्तरी, एक अर्दली, एक चालक और एक चपरासी शामिल हैं।
🔴 वरिष्ठ सहायक का कोई पद इस सूची में शामिल नहीं है।
ऐसे में 14 अक्टूबर 2022 को सुभाष यादव का “वरिष्ठ सहायक” पद पर पदोन्नति अपने आप में स्पष्ट नियम उल्लंघन है।
🟢 पदोन्नति नहीं, “व्यवस्था की धांधली”
जानकारों के अनुसार, वर्ष 2021 में डायट कुशीनगर से स्थानांतरित होकर आए सुभाष यादव ने डीआईओएस कार्यालय में कनिष्ठ सहायक के रूप में जॉइन किया था। लेकिन महज एक साल दो माह अठारह दिन बाद ही वे वरिष्ठ सहायक बन गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि—
“बिना सृजित पद के पदोन्नति, सेवा नियमों की प्रत्यक्ष अवहेलना है। यह प्रक्रिया न केवल अवैध है बल्कि विभागीय मिलीभगत का परिणाम प्रतीत होती है।”
🟠 वेतन भुगतान भी सवालों के घेरे में!
अगर वरिष्ठ सहायक का पद अस्तित्व में ही नहीं है, तो फिर सुभाष यादव को तीन वर्षों से उस पद का वेतन कैसे जारी हो रहा है?
क्या वित्त विभाग या लेखाधिकारी ने इस प्रक्रिया की वैधता कभी जांची?
यह प्रश्न सिर्फ वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि राजकोषीय अपराध की ओर संकेत करता है।
🟣 26 वर्षों से एक ही जिले में “जमे रहना” — नियमों की धज्जियाँ!
इतना ही नहीं, सुभाष यादव की सेवा यात्रा पर नजर डालें तो तस्वीर और भी संदिग्ध हो जाती है। बताया जाता है कि सुभाष यादव की प्रारंभिक नियुक्ति चपरासी के पद पर हुई थी। धीरे-धीरे वे कनिष्ठ सहायक बने और अब बिना पद सृजन के वरिष्ठ सहायक का तमगा भी पा गए।
शासनादेश के मुताबिक किसी भी कर्मचारी को एक पटल पर तीन वर्ष और एक जनपद में पांच वर्ष से अधिक नहीं रहना चाहिए। इसके बावजूद सुभाष यादव पिछले 26 वर्षों से कुशीनगर में जमे हुए हैं।
क्या यह सिर्फ “संयोग” है या किसी प्रभावशाली संरक्षण का परिणाम?
∆ विधि विशेषज्ञ बोले — पदोन्नति पूर्णतः अवैध
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि,
“किसी ऐसे पद पर पदोन्नति जहां पद ही अस्तित्व में न हो, न केवल नियम विरुद्ध है बल्कि यह पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। यदि जांच निष्पक्ष हुई तो यह मामला निलंबन और रिकवरी तक जा सकता है।”
⚫ सवाल जिनका जवाब विभाग को देना होगा!
- जब वरिष्ठ सहायक का पद सृजित ही नहीं है, तो पदोन्नति आदेश जारी कैसे हुआ?
- तीन वर्षों से वरिष्ठ सहायक का वेतन किस आदेश पर जारी हो रहा है?
- शासनादेश के बावजूद सुभाष यादव 26 वर्षों से कुशीनगर में क्यों जमे हैं?
- क्या मंडल या विभागीय स्तर पर इस पूरी प्रक्रिया की कोई वैधानिक जांच हुई?
🟥 निष्कर्ष: भ्रष्टाचार की परतें खुलनी बाकी हैं
डीआईओएस कार्यालय कुशीनगर की यह “बिना पद की पदोन्नति” सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की परंपरा की झलक है जो वर्षों से सरकारी दफ्तरों में पनप रही है।
अगर शासन ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई तो संभव है कि “बिना पद की पदोन्नति” के और भी कई उदाहरण सामने आएं।
अब सवाल यह है — क्या शासन इस स्पष्ट भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करेगा, या यह फाइल भी रजाई के नीचे दबा दी जाएगी?
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